दो गौरैया | Do Gauraiya | Two sparrow | Hindi Story

             

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                               दो गौरैयां 

घर में हम तीन व्यक्ति रहते हैं- मां, पिताजी और मैं। पर पिताजी कहते हैं कि यह घर सराय बना हुआ है। हम तो जैसे यहां मेहमान हैं, घर के मालिक तो कोई दूसरे हैं। आंगन में आम का पेड़ है। जो भी पक्षी पहाड़ियों-घाटियों पर से उड़ता हुआ दिल्ली पहुंचता है, पिताजी कहते हैं, वही सीधा हमारे घर पहुंच जाता है, जैसे हमारे घर का पता लिखवाकर लाया हो। यहां कभी तोते पहुंच जाते हैं, कभी कौवे और कभी गौरैयां। घर के अंदर भी यही हाल है। वीसियों तो चूहे बसते हैं। 

ऐसे धमाचौकड़ी मचती है कि कभी बर्तन गिरते हैं, कभी डिब्बे खुलते हैं, कभी प्याले टूटते हैं। एक चूहा अंगीठी के पीछे बैठना पसंद करता है; शायद बुढा है, उसे सर्दी बहुत लगती है। एक दूसरा है जिसे बाथरूम की टंकी पर चढ़कर बैठना पसंद है, उसे तो शायद गर्मी बहुत लगती है। बिल्ली, मन आया तो अंदर आकर दूध पी गई, न मन आया तो बाहर से ही ‘फिर आऊंगी’ कहकर चली जाती।

 शाम पड़ते ही दो-तीन चमगादड़ कमरों में कसरत करने लगते हैं। घर में कबूतर भी है दिन भर ‘गुटर-गू गुटर-गू’ का संगीत सुनाई देता रहता है। इतने पर भी बस नहीं,घर में छिपकलियां भी है और बर्र भी हैं और चीटियों की तो जैसे फौज की छावनी डाले हुए हैं। अब एक दिन दो गौरैया सीधी अंदर घुस आई। फिर जैसे आई थी वैसे ही उड़ भी गई।

 पर दो दिन बाद हमने क्या देखा की बैठक की छत में लगे पंखे के गोले में उन्होंने घोंसला बना लिया है हम पर पिताजी को गुस्सा आ गया। वह उठ खड़े हुए और बोले, “देखता हूं यह कैसे यहां रहती है।”छोड़ो जी चूहे को तो निकाल नहीं पाए, अब चिड़ियों को निकालोगे?”मां ने व्यंग से कहा। 

वह फौरन उठ खड़े हुए और पंखे के नीचे जाकर जोर से ताली बजाई और मुंह से ‘शू…शू…’कहा, फिर बांहे झुलाई, फिर खड़े-खड़े कूदने लगे, कभी बाहे झूलाते कभी ‘शू…शू…‘करते। मां को ऐसे मौके पर हमेशा मजाक सूझता है। हंसकर बोली,”चिड़ियों एक-दूसरे से पूछ रही है कि ये आदमी कौन है और नाच क्यों रहा है?”पिता जी बार से लाठी उठा लाए।

 उन्होंने लाठी ऊंची उठाकर पंखे के गोले ठकोरा। ची-ची करती गोरैया उड़कर पर्दे के डंडे पर जा बैठी। पिताजी लाठी उठाकर डंडे की और लपके। एक बार तो झूलती लाठी मां के सिर पर लगते-लगते बची। ची ची करती चिड़िया कभी एक जगह तो कभी दूसरी जगह जा बैठती। आखिर दोनों किचन की और खुलने वाले दरवाजे में से बाहर निकल गई।

 पिताजी ने लाठी दीवार के साथ टीका कर रख दी और छाती फुलाए कुर्सी पर जा बैठे। तभी पंखे के ऊपर से ‘ची-ची’ की आवाज सुनाई पड़ी। दोनों गौरैया फिर से अपने घोंसले में मौजूद थीं। “दरवाजे के नीचे से आ गई हैं।” मां बोली। अब तो पिता जी गौरैया पर पिल पड़े उन्होंने दरवाजे के नीचे कपड़े ठूंस दिए, रोशनदान में भी कपड़ा ठूंस दिया और एक बार फिर चिड़िया को खदेड़ दिया। इतने में रात हो गई।

 हमने समझा चिड़िया अपनी हार मान कर दूसरी जगह चली गई होगी। दूसरे दिन इतवार था तो वे फिर से मौजूद थीं और मजे से मल्हार गा रही थी। अब तो रोज यही कुछ होने लगा दिन में तो यह बाहर निकाल दी जाती पर रात के वक्त ना जाने किस रास्ते से वे अंदर घुस आती। पिताजी परेशान हो उठे। कहां- “मैं हार मानने वाला आदमी नहीं।

“वह फौरन ही बाहर से एक स्टूल उठा लाए लाठी लेकर स्टूल पर चढ़ गए घोसले में से अनेक तिनके बाहर की और लटक रहे थे, गौरैया ने सजावट के लिए मानो झालर टांग रखी हो बाहर आंगन में दोनों गौरैया चुपचाप दीवार पर गुमसुम बैठी थी। अब वे चहक भी नहीं रही थी। अब पिताजी लाठी का सिरा घास के तिनको के ऊपर रखकर वही रखे-रखे घुमाने लगे। घोंसले के तिनके लिपटते गए, लिपटते गए।

 सूखी घास और रूई के फाहे,धागे और थिगलिया लाठी के सिर पर लिपटने लगी। तभी साहस जोर की आवाज आई; “ची… ची… ची… ची…!!!”पिताजी के हाथ ठिठक गए। यह कहा? मैंने झट से बाहर देखा। नहीं, दोनों गौरैया घोंसले के बाहर गुमसुम बैठी थी। 

पंखे के गोले के ऊपर से दो नन्ही नन्ही गौरैया सिर निकालें नीचे की ओर देख रही थी और ची-ची किए जा रही थी। मानव अपना परिचय दे रही थी, “हम आ गए हैं। हमारे मां-बाप कहां हैं?”पिताजी स्टूल से नीचे उतर आए। कमरे में फिर से शोर होने लगा, पर अब की बार पिताजी उनकी और देखकर केवल मुस्कुराते रहे।

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